मधुश्रावणी: मिथिला में नवविवाहिताओं का प्रेम और अखंड सौभाग्य का पर्व
सावन के पवित्र महीने में नवविवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला 15 दिवसीय पावन पर्व मधुश्रावणी, नाग देवताओं और गौरी-शंकर की पूजा की एक अनुपम सांस्कृतिक झलक है।

मधुश्रावणी मिथिला क्षेत्र में नवविवाहित महिलाओं द्वारा सावन (श्रावण) के हिंदू महीने में मनाया जाने वाला एक अत्यंत जीवंत 15 दिवसीय मानसून उत्सव है। यह नवदंपति के सुखी, दीर्घायु और प्रेमपूर्ण वैवाहिक जीवन की कामना के लिए देवी गौरी, भगवान शिव और नाग देवताओं (नाग-नागिन / विषहरी) को समर्पित है। यह पावन समय उत्तर बिहार में वर्षा ऋतु के आगमन के साथ आता है, जिससे संपूर्ण मिथिलांचल की धरती हरी-भरी और अत्यंत मनमोहक हो जाती है।
नैहर, भार और ससुराल की परंपरा
प्राचीन मैथिल परंपरा के अनुसार, विवाह के पहले वर्ष यह उत्सव नवविवाहिता के मायके यानी नैहर में मनाया जाता है। इसका एक प्रमुख आकर्षण वर पक्ष (ससुराल) की ओर से भेजा जाने वाला भार है, जिसमें पूजा की सामग्री, नए वस्त्र, फल और मिष्ठान प्रतिदिन भेजे जाते हैं। पूजा के अंतिम दिन वर स्वयं अपने परिवार के साथ नैहर आता है और उपहारों का आदान-प्रदान होता है, जो दोनों परिवारों के स्नेह सूत्र को और अधिक मजबूत करता है।
फूल लोढ़ी और पारंपरिक गीत


प्रतिदिन सुबह दुल्हन सुंदर पारंपरिक वस्त्रों मैथिल हेरिटेज वस्त्र को धारण कर अपनी सहेलियों के साथ बाग-बगीचों में जाती है और ताजे फूल जैसे गेंदा, गुलाब और स्थानीय *चीरा-मीरा* के फूल बांस की टोकरी में एकत्रित करती है, जिसे 'फूल लोढ़ी' कहा जाता है। फूल एकत्रित करने की इस रस्म के दौरान महिलाएं एक पारंपरिक लोक गीत गाती हैं।
सखि फूल लोढ़े गेलहुं फूलवरिया संग में सहेलिया ना कोइ बेली फूल लोढ़े, कोइ चमेली फूल लोढ़े कोइ लोढ़ि लाय चम्पा के कलिया संग में सहेलिया ना कोइ राम वर मांगे, कोइ श्याम वर मांगे कोइ मांग लेलेहन भंगिया भिखारिया संग में सहेलिया ना
इस पारंपरिक गीत में भगवान शिव को बड़े ही आदर और प्रेम से 'भंगिया भिखारिया' (भंग पीने वाले भिक्षुक) कहकर पुकारा गया है, जो मिथिलांचल की ईश्वर के साथ एक आत्मीय और सहज रिश्ते को प्रदर्शित करता है।
मिट्टी की मूर्तियां और बिधकरी की कथाएं
उत्सव के दौरान नवविवाहिता मिट्टी से तैयार की गई भगवान शिव, माता पार्वती और नागों की पांच बहनों (विषहरी) की प्रतिमाओं की पूजा करती है। घर की कोई बुजुर्ग महिला, जिन्हें बिधकरी कहा जाता है, वे प्रतिदिन गौरी-शंकर, गंगा और नाग देवों से जुड़ी पौराणिक कथाएं सुनाती हैं। यह पूजा घर के सज-धज कर तैयार किए गए कोहबर कक्ष में होती है, जो अद्भुत मधुबनी पेंटिंग्स से सुसज्जित होता है।
टेमी दागने की प्रथा और भंडारा
पूजा के अंतिम दिन 'टेमी' की रस्म निभाई जाती है, जहां जलती हुई सूती बत्ती दुल्हन के घुटनों को स्पर्श कराकर दागी जाती है, जो वैवाहिक जीवन के कष्टों को सहने की सहनशीलता का प्रतीक है। पूजा की पवित्रता बनाए रखने के लिए दुल्हन इस दौरान बिना नमक का भोजन करती है और शुद्ध मिथिला पूजा सामग्री का ही उपयोग किया जाता है। महोत्सव का समापन एक भव्य सामूहिक भोज यानी भंडारा के साथ होता है, जो आपसी एकता को बढ़ावा देता है।
📚 सांस्कृतिक शब्दावली और प्रमुख शब्द
- नैहर
- नवविवाहिता का मायके का घर, जहां परंपरा के अनुसार शादी के प्रथम वर्ष मधुश्रावणी पूजा की जाती है।
- भार (Bharo)
- वर पक्ष की तरफ से नवविवाहिता के लिए भेजे जाने वाले उपहार, वस्त्र और दैनिक पूजा की वस्तुएं।
- बिधकरी
- घर या गांव की वह वयोवृद्ध महिला जो नवविवाहिता को प्रतिदिन पौराणिक और लोक कथाएं सुनाती हैं।
- चीरा-मीरा
- मिथिलांचल के जलमग्न क्षेत्रों में सावन के महीने में खिलने वाला एक विशेष मौसमी फूल जो पूजा में विशेष रूप से चढ़ाया जाता है।
- भंडारा
- पूजा के अंतिम दिन आयोजित होने वाला एक भव्य सामूहिक भोज जो सामाजिक एकता और सद्भाव का प्रतीक है।
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मिथिला धरोहर — Preserving Heritage
